पराया धन

एक महीने के लंबे ईलाज के बाद कल शाम मां को अस्पताल से छुट्टी मिली। हम सबने ईश्वर का धन्यावाद किया और राहत की सांस ली। मैं भी एक दो दिन में  ससुराल वापस वापस जाने की योजना बनाने लगी। मां की देखभाल के लिए पिछले एक सप्ताह से मायके में ही थी
। घर और अस्पताल के खाने आदि की व्यवस्था के कारण भाभी का अस्पताल में रहना संभव नहीं था। 
आज सुबह भाभी को मां के लिए नाश्ता लाते देखकर मै मां के अधिक निकट बैठ गई। डाक्टर ने खाने पीने संबंधी बहुत हिदायतें दी थी। नाश्ते में नमकिन दलिया के साथ एक छोटी सी कटोरी में गुड़ वाले मीठे चावल देखकर में गुस्से से भर गई, 'ये क्या भाभी, नाश्ते में कौन मीठे चावल बनाता है? और तुम्हें तो अच्छी तरह पता है कि मां डायबिटीज की मरीज है। कल छुट्टी देते वक्त डाक्टर ने कितनी हिदायतें दी है, तुम तो वंहा थी नहीं न! भैया से सब समझ लेना।' 
मेरा अधिकार पुर्ण आक्रोश देखकर भाभी रूआंसी सी बोली, 'दीदी, मैं जानती हूँ कि मां के लिए मीठा नुकसानदायक है। असल में मां को गुड़ वाले मीठे चावल बहुत पंसद है और वो इतने लम्बे समय बाद स्वस्थ्य होकर घर लौटी है। मै मां के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहती थी। वैसे, मैने इनमें नाममात्र गुड डाला है और आज सुबह आपके उठने से पहले ही मैने मां को बहला-फुसलाकर आधा कप करेले का जूस पिला दिया था। फिर भी, आप कहे तो मै चावल किचन में छोड़ आती हूं। 
कटोरी में रखे, मात्र दो चम्मच चावल को फिर गौर से देखकर मैं शर्मिंदा-सी, सोचने पर विवश थी कि कैसे समय के अंतराल से, 'अपना धन' 'पराया धन' और 'पराया धन' 'अपना धन' अपना हो जाता है। मैने फिर भी मुस्कराकर कहां, 'मां को खिलाना नहीं, बस दिखा भर देना। वो वैसे ही खुश हो जाएगी।

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