SAMAJ KI PARVAAH KYOU...?


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                       ... समाज की इतनी परवाह क्यों ?
                              25/12/18@4.05PM

करीब छः साल हो गए अपने घर गए हुए। वो घर जहां मेरा बचपन बीता, जहां अपनी बहनों के  साथ घर-घर खेली, मॉ के हाथों का खाना, पापा का प्यार, भाई का साथ... पता नहीं कभी वापस मिल पाएगा या नहीं। मैंने प्रेम विवाह किया था, इसलिए मायके के दरवाजे मेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो गए। बात मेरी ननद कि शादी कि हैं। खुशी का अवसर था तो सोचा अपने पीहर वाले को भी विवाह का न्योता दूं। शायद इसी बहाने सब पहले कि तरह ठीक हो जाए। डर भी था कि मुझे देखकर वे लोग कैसी प्रतिक्रिया देंगे, उनका व्यवहार कैसा होगा? फिर सोचा खुशी के मौके पर उनको बुलाऊंगी, तो हो सकता है मान जाएं या कम से कम मुझे उन्हें देखने का एक मौका तो मिलेगा। बड़ी हिम्मत जुटा कर ससुराल वालों से कहा कि मुझे अपने पीहर न्योता भेजना है। सबने कहा हमे अच्छा लगेगा अगर वो लोग आएं। मेरे पति ने कहा एक बार अच्छी तरह सोच लो, तुम्हारे भैया-भाभी हमें बिल्कुल पसंद नहीं करते। पर मेरी जिद के आगे उन्हें हारना पड़ा। मैं, मेरे पति और मेरी तीन साल कि बेटी, मेरे पीहर के लिए रवाना हो गए। निकलते वक्त सासु जी ने घर पर देने के लिए बड़े प्यार से शादी का कार्ड, गुड़ और शगुन का समान दिया। पुरे रास्ते मैं यही सोचती रही कि सालो बाद मैं अपने घर जा रही हूँ। वहीं घर जहां मैंने अपने जीवन के 26 वर्ष बिताए। मैं अपने पति को बताती जा रही थी कि इस रास्ते से मै स्कूल जाती थी, यहां मेरी सहेली का घर, यहां से मैं चूड़ियाँ लेती थी और इस मंदिर में हर रोज शाम को मम्मी के साथ दर्शन के लिए आती थी... कुछ नहीं बदला सब कुछ वैसा ही है।
हमारी गाड़ी मेरे घर के आगे रुकी। घर के दरवाजे तो मेरी भतीजी, भतीजा सामने खड़े थे, हमें देखकर पहले तो पैर छुए, फिर अंदर चले गए। मम्मी-पापा और भाभी बाहर आए। सब ऐसे देख रहे थे, जैसे पता नहीं कौन उनके घर आ गया है। मैंने ही बात करने कि शुरुआ की और कहा कि ननद कि शादी का न्योता लेकर आई हूँ और मैंने कार्ड और शगुन का गुड़ मम्मी के हाथ में रखा। पहले तो उनका रुख इंकार का लगा फिर उन्होंने सामान ले जाकर अंदर मेज पर रख दिया और कहा, 'तू, यहां क्यूं आई है,चली जा। कोई नहीं आने वाला, चली जा बेटा'। पापा भी उन्हीं की बातों का समर्थन कर हमें वापस जाने को कह रहे थे। उनकी आंखों मे मेरे लिए प्यार और मेरे जाने का दुख साफ नजर आ रहा था। कितने मजबूर और लाचार लग रहे थे समाज के डर के आगे। कुछ ही देर में मेरी भाभी ने तीखे शब्दों के बाण चलाने शुरू कर दिए,' निकल जाओ यहां से, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?' पापा ने जैसे-तैसे उनको चुप करवाया और हमें जाने के लिए कहा। हमने गाड़ी का दरवाजा खोला ही था कि मेरी भाभी ने कार्ड और गुड बाहर नाले में फेंक दिया। मुझे बहुत गुस्सा आया, मैने गीला होने से बच गया शादी का कार्ड उठाया और पापा के पास जाकर उनसे लिपटकर रोने लगी। मेरे पति इतनी देर तक चुप रहे पर भाभी की इस हरकत पर उन्हें भी गुस्सा आया। बोले, 'कहां है आपके भैया? मुझे अभी उनसे बात करनी है इनकी इतनी हिम्मत कैसे हुई, इनको तमीज नहीं है क्या?' मेरे पति ने पापा से कहा, 'ये घर उतना ही मेरी पत्नी का भी है जितना इनका।' ये संस्कार है आप के घर की बहूओ में, तो मुझे फख्र  है कि मैं आप की जाती का नहीं हूं और आप की बेटी को भी इस गंदगी से दूर ले गया। '
मुझे अफसोस हो रहा था कि मैं इन्हें और अपनी बेटी को यहाँ लेकर ही क्यूँ आई, इनकी यहां बेइज्जती हो रही थी और मैं कुछ नहीं कर पाई। मेरा गुनाह बस यहीं था कि अपनी पंसद से दुसरी जाती में विवाह किया था, जिसकी सजा मुझे परिवार वाले आज तक दे रहे हैं।

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